गढ़वाल और कुमाऊँ · पौराणिक कथा
नंदा चली ससुराल
पहाड़ों की बेटी-देवी और राजजात की यात्रा।

पहाड़ों में नंदा कोई दूर की देवी नहीं — वे बेटी हैं। पहाड़ों में जन्मी, कैलास पर्वत पर रहने वाले शिव से ब्याही, वे हर उस पहाड़ी लड़की की तरह हैं जो ब्याह के बाद अपना मायका छोड़कर जाती है।
गीत कहते हैं कि एक बार नंदा अपने मायके आईं और बहुत दिनों तक रुकी रहीं, और धरती तब तक बेचैन रही जब तक उन्हें उपहारों के साथ विधिपूर्वक विदा नहीं किया गया। तब से उनके लोग धूमधाम से उन्हें ससुराल पहुँचाने जाते हैं।
यही है नंदा देवी राजजात: नौटी गाँव से निकलने वाली एक यात्रा, जो जंगलों, बुग्यालों और नर-कंकालों वाली रूपकुंड झील से होती हुई होमकुंड तक चढ़ती है, जिसकी अगुवाई चार सींगों वाला एक मेढ़ा करता है, जो नंदा के उपहार लिए चलता है। होमकुंड से वह मेढ़ा अकेला ही पहाड़ों में आगे चला जाता है।
रास्ते भर गाए जाने वाले गीत अपनी बेटी को विदा करती माँ के आँसुओं और आशीषों से भरे होते हैं — इसीलिए राजजात हर पहाड़ी का मन छू जाती है।
पहाड़ अपनी देवी को अपने परिवार की तरह देखते हैं।
अगली कहानीकाफल पाको, मैं नि चाखो