भारतीय-आर्य (मध्य पहाड़ी)
कुमाऊँनी
कुमाऊँनी
- कहाँ
- कुमाऊँ
- बोलने वाले
- लगभग 20 लाख (जनगणना 2011 में ~20.8 लाख दर्ज)
- लिपि
- देवनागरी
- स्थिति
- संवेदनशील — घरों में बोली जाती है, पर कम बच्चे इसे सीख रहे हैं, ख़ासकर शहरों में और प्रवासियों के बीच।
कुमाऊँनी का लिखित साहित्य कम से कम कवि गुमानी पंत (1790–1846) तक जाता है। गौर्दा (गौरी दत्त पांडे), शेरदा ‘अनपढ़’ और गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ ने इसे प्रतिरोध और हास्य की भाषा बनाया। जॉर्ज ग्रियर्सन के Linguistic Survey of India ने इसे पूर्वी और पश्चिमी बोली-समूहों में बाँटा।
उपबोलियाँ: खसपर्जिया (अल्मोड़ा), पछाईं, फल्दाकोटिया, चौगर्खिया, गंगोली, दनपुरिया, सोर्याली (सोर घाटी), सीराली, अस्कोटी, कुमैयाँ (चंपावत), जोहारी
भारतीय-आर्य (मध्य पहाड़ी)
गढ़वाली
गढ़वाली
- कहाँ
- गढ़वाल
- बोलने वाले
- लगभग 25 लाख (जनगणना 2011 में ~24.8 लाख दर्ज)
- लिपि
- देवनागरी
- स्थिति
- संवेदनशील — जीवंत गीत-परंपरा समृद्ध है, पर नई पीढ़ी में रोज़मर्रा का प्रयोग घट रहा है।
गढ़वाली की लिखित और मौखिक परंपरा सशक्त है — पांडव और जागर गाथाओं से लेकर कन्हैयालाल डंड्रियाल और अबोध बंधु बहुगुणा जैसे कवियों तक, और नरेंद्र सिंह नेगी के आधुनिक गीतों तक, जिन्होंने इस भाषा को हर घर में जीवित रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है।
उपबोलियाँ: श्रीनगरिया (मानक), टिहर्याली / गंगपरिया, बधाणी, दसौल्या, लोहब्या, राठी, माँझ-कुमैयाँ, नागपुरिया, सलाणी, रवाल्टी
भारतीय-आर्य (पश्चिमी पहाड़ी)
जौनसारी
जौनसारी
- कहाँ
- जौनसार-बावर, देहरादून
- बोलने वाले
- लगभग 1,00,000 से अधिक
- लिपि
- देवनागरी
- स्थिति
- संवेदनशील
यह गढ़वाली की अपेक्षा हिमाचल प्रदेश की पश्चिमी पहाड़ी भाषाओं के अधिक निकट है। इसमें पर्व-गीतों (बिस्सू, मरोज़) और महासू देवता के लिए गाई जाने वाली गाथाओं का विशाल भंडार है।
उपबोलियाँ: जौनसारी, बावरी
तिब्बती-बर्मी (पश्चिमी हिमालयी)
रं भाषाएँ (भोटिया)
रङ / भोटिया बोलियाँ
- कहाँ
- दारमा, ब्यांस, चौदांस (पिथौरागढ़); नीती–माणा (चमोली)
- बोलने वाले
- प्रत्येक के कुछ हज़ार
- लिपि
- परंपरागत रूप से मौखिक; देवनागरी में लिखी जाती हैं
- स्थिति
- संकटग्रस्त — कई भाषाएँ यूनेस्को के Atlas of the World's Languages in Danger में सूचीबद्ध हैं।
‘भोटिया’ एक व्यापक प्रशासनिक शब्द है, जिसमें ऊँची घाटियों के कई अलग-अलग समुदाय आते हैं जो तिब्बत के मार्गों पर व्यापार करते थे। हर घाटी की अपनी भाषा है; रं लोग ‘भोटिया’ की जगह अपना नाम पसंद करते हैं। कभी दारमा के पास बोली जाने वाली रंग्कस भाषा को विलुप्त माना जाता है।
उपबोलियाँ: ब्यांसी, दारमिया, चौदांसी, रोंग्पो (मार्छा / तोल्छा, चमोली), जोहारी शौका समुदाय मुख्यतः कुमाऊँनी बोलते हैं
भारतीय-आर्य
थारू
थारू
- कहाँ
- तराई — खटीमा, सितारगंज, नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर)
- बोलने वाले
- उत्तराखंड में दसियों हज़ार (राणा थारू)
- लिपि
- देवनागरी
- स्थिति
- संवेदनशील — तेज़ी से हिंदी की ओर खिसक रही है।
थारू उत्तराखंड की पाँच अनुसूचित जनजातियों में से एक हैं, जो लंबे समय से मलेरिया-ग्रस्त तराई के वनवासी रहे हैं। राणा थारू बोली में कुमाऊँनी, अवधी और नेपाल की थारू भाषाओं की विशेषताएँ मिलती हैं। उनकी संस्कृति में होली के विशिष्ट नृत्य, रंग-बिरंगी कढ़ाईदार पोशाकें और बाँस की कारीगरी शामिल हैं।
उपबोलियाँ: राणा थारू
भारतीय-आर्य
बुक्सा
बुक्सा
- कहाँ
- तराई और भाबर — बाजपुर, काशीपुर, डोईवाला, विकासनगर
- बोलने वाले
- छोटा समुदाय
- लिपि
- देवनागरी
- स्थिति
- संकटग्रस्त
बुक्सा (बोक्सा) पहाड़ों के नीचे की वन-पट्टी की एक अनुसूचित जनजाति है, जो परंपरागत रूप से किसान और वन-श्रमिक रहे हैं। उनकी मौखिक विरासत का बड़ा हिस्सा अभी तक दर्ज नहीं हुआ है।
तिब्बती-बर्मी
राजी
राजी
- कहाँ
- अस्कोट और धारचूला के वन (पिथौरागढ़), चंपावत के कुछ भाग
- बोलने वाले
- एक हज़ार से कम
- लिपि
- मौखिक
- स्थिति
- गंभीर रूप से संकटग्रस्त
राजी (वन रावत) भारत की सबसे छोटी जनजातियों में से हैं, ऐतिहासिक रूप से वनवासी, जो लकड़ी की कारीगरी के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। उनकी भाषा पश्चिमी नेपाल की राउटे भाषा से निकटता से जुड़ी है। किसी राजी भाषी की हर रिकॉर्डिंग अनमोल है।