इतिहास
इतिहास
चित्रित शैलाश्रयों से लेकर 1994 के राज्य आंदोलन तक — केदारखंड और मानसखंड की कहानी, जिन्हें आज हम गढ़वाल और कुमाऊँ कहते हैं।

समयरेखा
- प्रागैतिहासिक काल
लखुडियार के शैलाश्रय
अल्मोड़ा में बाड़ेछीना के पास, सुयाल नदी के किनारे लखुडियार के चित्रित शैलाश्रयों में लाल, काले और सफ़ेद रंगों से बनी मनुष्यों, पशुओं और लहरदार रेखाओं की आकृतियाँ हैं — ये कुमाऊँ की पहाड़ियों में बची मानवीय अभिव्यक्ति के सबसे पुराने चिह्नों में से हैं। ऊपरी धौली घाटी (चमोली) के मलारी में भी महापाषाणकालीन समाधियाँ और पुरावशेष मिले हैं।

© Ramwik · CC BY-SA 3.0 - पौराणिक काल
केदारखंड और मानसखंड
स्कंद पुराण इस क्षेत्र का वर्णन दो भागों में करता है: केदारखंड (लगभग आज का गढ़वाल) और मानसखंड (लगभग आज का कुमाऊँ)। इस भूमि को देवभूमि — देवताओं की धरती — के रूप में याद किया जाता है, जहाँ गंगा और यमुना के उद्गम हैं और महाभारत तथा पांडवों से जुड़े अनगिनत स्थल हैं।

© Aditya Siva · CC0 - लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व
कालसी में अशोक का शिलालेख
देहरादून ज़िले में यमुना के पास कालसी में क्वार्ट्ज़ की एक विशाल शिला पर सम्राट अशोक के चौदह प्रमुख शिलालेख ब्राह्मी लिपि में अंकित हैं — यह इस बात का प्रमाण है कि यह तराई-पहाड़ी क्षेत्र मौर्य जगत के महत्वपूर्ण मार्गों पर स्थित था।

© Ms Sarah Welch · CC0 - लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व – तीसरी शताब्दी ईस्वी
कुणिंद
मध्य हिमालय के सबसे प्राचीन ज्ञात शासक जनों में से एक, कुणिंदों ने चाँदी और ताँबे के सिक्के चलाए, जो पूरे क्षेत्र में मिले हैं। उनके शासन ने पहाड़ों को गंगा के मैदानों के व्यापार और धार्मिक जीवन से जोड़ा।

© CNG Coins · CC BY-SA 3.0 - लगभग 7वीं – 11वीं शताब्दी
कत्यूरी राज्य
कत्यूरियों ने आज के उत्तराखंड के बड़े हिस्से पर राज किया — पहले जोशीमठ से, फिर बैजनाथ के पास कत्यूर घाटी में स्थित कार्तिकेयपुर से। जागेश्वर, बैजनाथ और बागेश्वर के भव्य पाषाण मंदिर उन्हीं के संरक्षण में फले-फूले। केंद्रीय सत्ता कमज़ोर पड़ने पर राज्य छोटी-छोटी रियासतों में बँट गया, और अस्कोट तथा द्वाराहाट जैसे स्थानों पर कत्यूरी वंश की शाखाएँ बची रहीं।

© Yann (talk) · CC BY-SA 4.0 - 8वीं शताब्दी
हिमालय में आदि शंकराचार्य
आदि शंकराचार्य को चार प्रमुख मठों में से एक, ज्योतिर्मठ (जोशीमठ), की स्थापना और बदरीनाथ व केदारनाथ में पूजा-अर्चना के पुनरुद्धार का श्रेय दिया जाता है। बदरीनाथ में आज भी दक्षिण भारत के पुजारी सेवा करते हैं — उस युग से चली आ रही एक जीवंत कड़ी।

© Vishwanath Negi · CC BY 4.0 - लगभग 10वीं–13वीं शताब्दी से आगे
चंद वंश का उदय (कुमाऊँ)
परंपरा के अनुसार सोमचंद द्वारा स्थापित चंद वंश ने चंपावत से शासन किया और धीरे-धीरे पूरे कुमाऊँ को एक किया। 1563 में राजा बालो कल्याण चंद ने राजधानी अल्मोड़ा स्थानांतरित की, जो आगे चलकर पहाड़ों का सांस्कृतिक हृदय बना। चंदों को उनके मंदिरों, अल्मोड़ा के नंदा देवी उत्सव, और कला व विद्या के संरक्षण के लिए याद किया जाता है।

© ArmouredCyborg · CC BY-SA 4.0 - लगभग 9वीं शताब्दी से आगे
पंवार (परमार) वंश (गढ़वाल)
परंपरा के अनुसार कनकपाल ने चाँदपुर गढ़ी में इस वंश की नींव रखी। तब गढ़वाल अनेक छोटे-छोटे गढ़ों में बँटा था — प्रसिद्ध 52 गढ़ — जब तक कि राजा अजयपाल (14वीं शताब्दी) ने उन्हें एक नहीं किया और राजधानी पहले देवलगढ़ और फिर अलकनंदा के तट पर श्रीनगर ले गए। ‘गढ़वाल’ नाम का अर्थ ही है ‘गढ़ों की भूमि’।

© Nitin Maletha · CC BY-SA 4.0 - 17वीं शताब्दी
तीलू रौतेली, गढ़वाल की वीरांगना
लोकस्मृति गुराड़ गाँव (पौड़ी) की तीलू रौतेली का गुणगान करती है, जिन्होंने युद्ध में अपने पिता, भाइयों और मंगेतर को खोने के बाद किशोरावस्था में ही कत्यूरी आक्रमणकारियों के विरुद्ध योद्धाओं का नेतृत्व किया। महिलाओं की उपलब्धियों के लिए उत्तराखंड का सर्वोच्च सम्मान उन्हीं के नाम पर है।

© Botsaroj · CC BY-SA 4.0 - 1790
कुमाऊँ पर गोरखा विजय
आंतरिक कलह से कमज़ोर हुआ चंद राज्य 1790 में नेपाल के फैलते गोरखा राज्य के अधीन हो गया। गोरखा शासन का यह दौर — जिसे पहाड़ों में ‘गोरख्याणी’ के नाम से याद किया जाता है — भारी करों और बेगार के लिए जाना जाता है।

© Nepal · Public domain - 1803–1804
गढ़वाल का पतन; खुड़बुड़ा का युद्ध
1803 में आए भूकंप से गढ़वाल तबाह हो गया, जिसके बाद गोरखों ने आक्रमण किया। 1804 में देहरादून के पास खुड़बुड़ा में लड़ते हुए राजा प्रद्युम्न शाह वीरगति को प्राप्त हुए, और गढ़वाल गोरखों के नियंत्रण में आ गया।

© AnonymousUnknown author · Public domain - 1814–1816
आंग्ल-नेपाल युद्ध और सुगौली की संधि
ईस्ट इंडिया कंपनी ने आंग्ल-नेपाल युद्ध में गोरखों को पराजित किया। सुगौली की संधि (1816) के तहत कुमाऊँ और पूर्वी गढ़वाल ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आ गए, जबकि पश्चिमी गढ़वाल सुदर्शन शाह को टिहरी गढ़वाल रियासत के रूप में लौटा दिया गया, जिसकी राजधानी टिहरी बनी।

© James Baillie Fraser · Public domain - 19वीं शताब्दी
हिल स्टेशन और रेजिमेंटें
अंग्रेज़ों ने नैनीताल (1841), मसूरी, रानीखेत और लैंसडाउन को विकसित किया। 1887 में लैंसडाउन में गढ़वाल राइफ़ल्स का गठन हुआ, और कुमाऊँनी सैनिक उस सेना की रीढ़ बने जो आगे चलकर कुमाऊँ रेजिमेंट कहलाई — यहीं से उस गौरवशाली सैन्य परंपरा की शुरुआत हुई जो आज भी लगभग हर पहाड़ी परिवार में जीवित है।

© Ashish Gupta from Noida, India · CC BY 2.0 - जनवरी 1921
कुली बेगार आंदोलन
बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में बद्री दत्त पांडे (‘कुमाऊँ केसरी’) के नेतृत्व में हज़ारों लोगों ने कुली बेगार — अधिकारियों के लिए जबरन और बिना मज़दूरी का बोझ ढोना — के रजिस्टर सरयू नदी में बहा दिए। यह प्रथा समाप्त हो गई; गांधीजी ने इसे ‘रक्तहीन क्रांति’ कहा।

© pramod nagher · CC BY 3.0 - 23 अप्रैल 1930
पेशावर में चंद्र सिंह गढ़वाली
हवलदार चंद्र सिंह गढ़वाली और रॉयल गढ़वाल राइफ़ल्स के सैनिकों ने पेशावर के क़िस्सा ख़्वानी बाज़ार में निहत्थे ख़ुदाई ख़िदमतगार प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश मानने से इनकार कर दिया। उनका कोर्ट-मार्शल हुआ; यह घटना स्वतंत्रता संग्राम में अंतरात्मा की आवाज़ का प्रतीक बन गई।

© franek2 · CC BY-SA 3.0 - 30 मई 1930
तिलाड़ी कांड (रवाईं)
टिहरी रियासत के रवाईं क्षेत्र के ग्रामीण, जो उनके परंपरागत हक़-हकूक छीनने वाले नए वन प्रतिबंधों का विरोध करने तिलाड़ी में इकट्ठा हुए थे, उन पर रियासत की सेना ने गोलियाँ चलाईं। उत्तरकाशी में यह दिन शहीद दिवस के रूप में याद किया जाता है।

© MSR2016 · CC BY-SA 4.0 - 25 जुलाई 1944
श्रीदेव सुमन
टिहरी रियासत के निरंकुश शासन के विरुद्ध संघर्ष करने वाले स्वतंत्रता सेनानी श्रीदेव सुमन ने 84 दिनों की भूख हड़ताल के बाद टिहरी जेल में प्राण त्याग दिए। उनके बलिदान ने उस आंदोलन को नई ऊर्जा दी जिसने रियासत का अंत किया।

© Swantikumar · CC BY-SA 4.0 - 1 अगस्त 1949
टिहरी का भारत में विलय
एक जन-विद्रोह (टिहरी प्रजामंडल आंदोलन) के बाद टिहरी गढ़वाल रियासत का भारतीय संघ में विलय हुआ और यह उत्तर प्रदेश का एक ज़िला बन गई।

© Dr Vikramjit Kakati · CC BY-SA 4.0 - 1973 से आगे
चिपको आंदोलन
मंडल और रैणी (चमोली) में ग्रामीणों ने — जिनमें 1974 में गौरा देवी के नेतृत्व में रैणी की महिलाएँ सबसे प्रसिद्ध हैं — व्यावसायिक कटान रोकने के लिए पेड़ों से चिपककर उन्हें बचाया। चंडी प्रसाद भट्ट और बाद में सुंदरलाल बहुगुणा से प्रेरित चिपको, सामुदायिक वन-संरक्षण का विश्वप्रसिद्ध प्रतीक बन गया।

© रघुबीर सिंह · CC BY-SA 4.0 - 1994
राज्य आंदोलन
अलग पर्वतीय राज्य की माँग, जो दशकों से उठती रही थी और जिसे उत्तराखंड क्रांति दल (स्थापना 1979) जैसे संगठनों ने संगठित किया, एक व्यापक जन-आंदोलन बन गई। खटीमा (1 सितंबर) और मसूरी (2 सितंबर) के गोलीकांड तथा रामपुर तिराहा कांड (2 अक्टूबर 1994) को इस संघर्ष के गहरे घावों के रूप में याद किया जाता है।

© Himalayanwarrior · CC BY 4.0 - 9 नवंबर 2000
उत्तरांचल का जन्म
उत्तर प्रदेश से अलग होकर यह राज्य भारत के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया और इसका नाम उत्तरांचल रखा गया। यह तिथि हर वर्ष उत्तराखंड स्थापना दिवस (राज्य स्थापना दिवस) के रूप में मनाई जाती है।

© NatashaRostova14 · CC0 - 1 जनवरी 2007
आधिकारिक रूप से उत्तराखंड
जन-आंदोलन द्वारा प्रयुक्त नाम का सम्मान करते हुए राज्य का नाम बदलकर उत्तराखंड किया गया। देहरादून राजधानी है, और 2020 में गैरसैंण (भराड़ीसैंण) को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया।

© Shivikaso · CC0 - जून 2013
केदारनाथ आपदा
केदारनाथ के ऊपर बादल फटने और एक हिमनद झील के टूटने से पूरे राज्य में विनाशकारी बाढ़ आई। हज़ारों लोगों ने अपनी जान गँवाई। इस त्रासदी ने हिमालय की नाज़ुक पर्वतीय पारिस्थितिकी और विकास को लेकर होने वाली बहस की दिशा ही बदल दी।

© Rohit Sharma · CC BY-SA 4.0
शासक राजवंश
प्रारंभिक राजवंशों की तिथियाँ शिलालेखों, सिक्कों और परंपरा से मिलती हैं, और इतिहासकारों में इन पर आज भी मतभेद है।
लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. – तीसरी शताब्दी ई.
कुणिंद
तराई-पहाड़ और मध्य पहाड़ियाँ
मुख्यतः सिक्कों से ज्ञात; इस क्षेत्र के सबसे प्राचीन नामित शासकों में से।
लगभग 7वीं – 11वीं शताब्दी
कत्यूरी
जोशीमठ, बाद में कार्तिकेयपुर (बैजनाथ)
जागेश्वर और बैजनाथ मंदिर समूहों के निर्माता; इनकी शाखाएँ अस्कोट, द्वाराहाट और डोटी में बची रहीं।
लगभग 10वीं/13वीं शताब्दी – 1790
चंद
चंपावत, अल्मोड़ा (1563 से)
कुमाऊँ को एक किया; अल्मोड़ा सांस्कृतिक राजधानी बना।
लगभग 9वीं शताब्दी – 1803 (टिहरी में 1949 तक)
पंवार / परमार
चाँदपुर गढ़ी, देवलगढ़, श्रीनगर, टिहरी
अजयपाल ने 52 गढ़ों को एक किया; वंश टिहरी रियासत के रूप में बना रहा।
1790 – 1815
गोरखा
नेपाल से शासन
अल्पकालीन, कठोर शासन, जिसे ‘गोरख्याणी’ के रूप में याद किया जाता है।
1815 – 1947
अंग्रेज़
कुमाऊँ मंडल (नैनीताल / अल्मोड़ा)
हिल स्टेशन, रेजिमेंटें, और वे वन क़ानून जिन्होंने प्रतिरोध को जन्म दिया।