PYRE (चिता)

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कुमाऊँ और गढ़वाल · लोककथा

काफल पाको, मैं नि चाखो

गर्मियों के जंगल में एक चिड़िया बार-बार एक ही बात क्यों पुकारती है।

Terrace farming on the way to Ransi village, Garhwal, Uttarakhand
© Varun Shiv Kapur · CC BY 2.0

बहुत पहले की बात है, जंगल के किनारे एक ग़रीब विधवा अपनी छोटी-सी बेटी के साथ रहती थी। गर्मियों की एक सुबह वह पहाड़ी पर चढ़ी और टोकरी भर काफल ले आई — वे छोटे-छोटे लाल फल, जो चैत और बैसाख में बस कुछ ही हफ़्तों के लिए पकते हैं।

'इनकी अच्छे से रखवाली करना,' उसने बेटी से कहा, 'और एक भी मत खाना। हम इन्हें बेचकर अनाज लाएँगे।' फिर वह खेतों की ओर चली गई।

दिन भर टोकरी पर कड़ी धूप पड़ती रही। शाम को जब माँ थकी-हारी और भूखी घर लौटी, तो काफल सूखकर सिकुड़ चुके थे — टोकरी आधी ख़ाली-सी दिख रही थी। ग़ुस्से में आकर उसने बेटी को मारा और चिल्लाई, 'तूने खा लिए!' बच्ची गिर पड़ी, और फिर कभी नहीं उठी।

उस रात बारिश हुई। सुबह तक काफलों ने नमी सोख ली और फूलकर फिर से टोकरी को लबालब भर दिया। तब माँ को समझ आया कि उसने क्या कर डाला है। रोते-रोते वह भी दुख से चल बसी।

लोग कहते हैं कि दोनों चिड़िया बन गईं। हर गर्मी में बेटी-चिड़िया जंगल में गाती है: 'काफल पाको, मैं नि चाखो' — काफल पक गए, पर मैंने चखे तक नहीं। और माँ-चिड़िया जवाब देती है: 'पुरै पुतई पुरै' — पूरे थे बेटी, वे तो पूरे ही थे।

हर पहाड़ी बच्चे को सुनाई जाने वाली कहानी — धैर्य के बारे में, और उस क्रोध के बारे में जिसका किया कभी लौटाया नहीं जा सकता।

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