कुमाऊँ · किंवदंती
घुघुतिया पर बच्चे कौवों को क्यों खिलाते हैं
घुघुती नाम का एक राजकुमार, एक दुष्ट मंत्री और वफ़ादार कौवों का एक झुंड।

कुमाऊँ के एक चंद राजा के बरसों तक कोई संतान नहीं हुई। राजा और रानी ने बागेश्वर में बागनाथ के दरबार में प्रार्थना की, और आख़िरकार उनके घर एक बेटा हुआ। रानी उसे प्यार से 'घुघुती' बुलाती थी — मीठी गुटरगूँ करने वाली फ़ाख़्ता के नाम पर। बालक के गले में घुँघरुओं की एक माला थी, जिसे छनकाना उसे बहुत भाता था।
जब बालक रूठ जाता, तो रानी उसे चिढ़ाती, 'काले कौवा, आ, घुघुती की माला ले जा!' — और कौवे आ जाते। राजकुमार को उनसे लगाव हो गया और वह रोज़ उन्हें खाना खिलाने लगा।
राजा का मंत्री गद्दी हथियाना चाहता था। उसने बालक को चुराया और जंगल में ले गया। पर कौवों ने सब कुछ देख लिया। एक कौवा नीचे झपटा और बालक के गले से घुँघरुओं की माला छीन ली, और पूरा झुंड काँव-काँव करता हुआ महल की ओर उड़ चला।
राजा कौवों के पीछे-पीछे जंगल पहुँचा, अपने बेटे को ढूँढ निकाला और मंत्री को दंड दिया। कृतज्ञता में रानी ने माला के आकार की मिठाइयाँ बनाईं और कौवों को खिलाईं।
इसीलिए हर मकर संक्रांति पर कुमाऊँ के बच्चे घुघुतों की माला पहनते हैं और भोर में पुकारते हैं: 'काले कौवा काले, घुघुती माला खा ले!' — आ कौवे, घुघुती की माला खा ले!
जीवों के प्रति दया लौटकर ज़रूर आती है।
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