गढ़वाल की अपनी दीवाली। गाँव वाले 'भैलो' खेलते हैं — रस्सियों से बँधे चीड़ की जलती लकड़ियों (छिल्ला) के गट्ठर घुमाते हैं — अलाव के चारों ओर नाचते हैं और मवेशियों को विशेष भोजन खिलाते हैं। लोक-स्मृति इसे वीर माधो सिंह भंडारी के तिब्बत से देर से लौटने से जोड़ती है।