कुमाऊँ और गढ़वाल · लोक काथ
काफल पाको, मैं नि चाखो
गर्मियों क जंगल में एक चड़ बार-बार उई बोल किलै बासूँ।

भौत पैलि कि बात छ, जंगल क किनार एक गरीब विधवा आपणि नानि चेलि दगै रूँछी। गर्मियों कि एक रत्तै ऊ धुर में चढ़ि और एक टोकरि काफल ल भरि ल्याई — ऊ नान लाल दाण जो चैत-बैसाख में खाली कुछ हफ्तों लिजी पाकनी।
'इनूँ कैं भलिकै रखाये,' वील चेलि कैं कौ, 'एक दाण लै झन खाये। इनूँ कैं बेचि बेर हम अनाज ल्याँल।' फिर ऊ खेतों में न्है गै।
दिन-भर टोकरि पर घाम पड़नै रौ। ब्याव कै जब इज थकी-भुकी घर ऐ, काफल सुकि बेर सिकुड़ि गेछी — टोकरि आदु खालि जसि देखीणैछी। गुस्स में वील चेलि कैं मारौ और धाद लगै, 'त्वील खै हालीं!' नानि चेलि लड़ि पड़ि, और फिर कभतै नि उठि।
वी रात द्यो लागौ। रत्तै काफलों ल नमी पी ल्हे और फिर फुलि गईं, टोकरि मुखमुख भरि गै। इज कैं समझ ऐ कि वील के करि हालौ। डाड़ मारनै-मारनै ऊ दुख ल मरि गै।
लोग कूँनी कि द्विए चड़ बणि गईं। हर गर्मी में चेलि-चड़ जंगल में बासूँ: 'काफल पाको, मैं नि चाखो' — काफल पाकि गईं, पर मैंल नि चाखा। और इज-चड़ जवाब दिं: 'पुरै पुतई पुरै' — पुर छी, म्येरि चेलि, पुरै छी।
हर पहाड़ी नान कैं सुणाई जाणी काथ — सबर कि, और ऊ गुस्स कि जैकैं फिर वापस नि ल्हि सकीन।
अघिल काथफ्योंली — पीव फूल