गढ़वाल · गाथा
जीतू बगड्वाल और आँछरी
एक बाँसुरी बजूणी जैकि धुन इतुक भलि छी कि आँछरियों ल वीकैं जाण नि दे।

जीतू बगड्वाल गढ़वाल क एक ज्वान छी जो आपणि बाँसुरी लिजी नामी छी। जब ऊ बजूँछी, गोरु चरण छोड़ि दिछी और गाड़-गध्यार लै सुणन जास लागछी।
एक बसंत ऊ रोपाई लिजी आपणि बैणि कैं घर ल्यूण हुँ निकलौ। जंगल बटी जानै वील बाँसुरी बजै — और आँछरियों ल, जो ऊँच बुग्यालों कि परी छन, सुणि और ऊँ वीकि धुन में मोहित है गईं।
ऊँ ल कौ कि त्वील हमार दगड़ हिटण पड़ल। जीतू ल आपण खेतों कि रोपाई पुर करण तक कि मोहलत मांगी। ऊँ मानि गईं — पर जै दिन रोपाई पुर भै, जब ऊ खेत जोतणैछी, आँछरी ऐनी और वीकैं बल्दों समेत ल्हि गईं।
आज तक 'जीतू बगड्वाल' गढ़वाल में एक पूज वाल नाच-नाटक क रूप में करी जां, और लोग आज लै ज्वानों कैं चेतूनी कि बुग्यालों में भौत मीठ बाँसुरी बजूनै झन घुमिया।
सुंदरता कि आपणि ताकत हुँ, और पहाड़ आपण भेद आपण पास राखनी।
अघिल काथमाधो सिंह भंडारी और मलेथा कि कूल