कुमाऊँ · गाथा
राजुला अर मालूशाही
हिमालै की बड़ि प्रेम गाथा — एक बैपारी की ब्यटुलि अर एक कत्यूरी राजकुमार।

राजुला ऊँचि घाटियौं का एक धनी बैपारी सुनपति शौका की ब्यटुलि छै, जु अपणि भेड़-बखर्यौं दगड़ि तिब्बत जांदु छौ। मालूशाही बैराठ कु राजकुमार छौ, कत्यूरी वंश कु। ऊंका ब्वे-बुबौंन जलम का बगत ही ऊंकु रिश्ता पक्कु करि याल छौ।
पर सुनपति कु मन बदलि ग्याई अर वेन राजुला कु रिश्ता एक ताकतवर हुणिया (तिब्बती) बैपारी दगड़ि पक्कु करि दे। राजुला, जैन मालूशाही तैं कभि नि बिसरि, यखुलि पहाड़ौं पार बैराठ जनै वेतैं खोजण चलि ग्याई।
मालूशाही का घौर वळौंन वेतैं नशा दे दे ताकि वु बिजिक वींसे मिलि नि साको। राजुला अपणि मुंदड़ि वेकि अंगुळि मा पैरैक दुखी मन से वापिस चलि ग्याई। जब वु बिजि अर मुंदड़ि देखि, त मालूशाही न अपणु महल छोड़ि दे, गुरु गोरखनाथ से जोगी की विद्या सीखि, अर भेस बदलिक भोटियौं का मुलुक जनै चलि ग्याई।
गाथा मा जहर वळा खाणा, जादू की नींद, अर गुरु का हाथौं मालूशाही का बचण की बात आंद। ज्यादातर रूपौं मा आखिर मा द्वी प्रेमी मिलि जांदन।
सदियौं तक कुमाऊँ का हुड़क्या कतगि रातौं तक यु गाथा गांदा रैन। मोहन उप्रेती न येतैं मंच पर उतारि, अर आज बि यु पहाड़ै सबसे नामी प्रेम कथा च।
वा माया जु पहाड़, जात अर राज पार करि जांद।
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